आप चाहे जैसे भी देखें, लोकसभा चुनाव के नतीजे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं.
नेहरू
युग के बाद 1971 में इंदिरा गांधी के दोबारा जीत कर आने के बाद से नरेंद्र
मोदी केवल दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें जनता ने दोबारा पूर्ण बहुमत से चुना है.बीजेपी ने न केवल अपने मज़बूत पश्चिमी और उत्तरी किलों पर फ़तह हासिल की बल्कि पूरब और यहां तक की दक्षिण में भी नए रास्ते बनाये हैं.
कांग्रेस ने अपने वोट शेयर में सुधार ज़रूर किया लेकिन अपनी सीटों की संख्या में मामूली सुधार ही कर सकी.
लेकिन राहुल गांधी परिवार के गढ़ अमेठी में हार गये- कांग्रेस यहां 1999 के बाद पहली बार हारी है, आज़ादी के बाद से यह अमेठी में कांग्रेस की तीसरी पराजय है.
बीजेपी को यह जीत पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के कारण मिली, जो अब भारत के ऐसे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन गए हैं जिसे इंदिरा गांधी के बाद देश ने देखा है. बीते पांच साल के कार्यकाल के दौरान काम करने में विफल रहे सांसदों और पार्टी के भीतर मौजूद कई ख़ामियों के बावजूद मोदी आसानी से सभी बाधाओं को पार करते हुए मतदाताओं से सीधी अपील करने में कामयाब रहे.
इसका मतलब है कि सभी वर्गों, ग्रामीण और शहरी विभाजन, जाति आदि को देखते हुए जिस सामाजिक गठबंधन के आधार पर विपक्ष बड़ी सावधानी से एकजुट हुआ था, प्रधानमंत्री से सामना होते ही बिखर गया.
नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि बेरोज़गारी, आर्थिक विकास और कृषि संकट जैसे सामाजिक-आर्थिक मसलों पर काबू पाने के लिए हिंदुत्व के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्धा एक बेहद मजबूत युग्म हो सकता है.
राहुल गांधी को विपक्ष की हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है और निश्चित ही उनके पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ है. 'चौकीदार चोर है' के साथ नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने की उनकी रणनीति एक बेहद ही ख़राब कदम था जो बुरी तरह विफल रहा.
गठबंधन करने में उनकी नाकामयाबी, प्रत्याशियों के चयन में देरी और प्रियंका गांधी को अंतिम समय में उतारने की चाल भी असफल रही.
लेकिन वास्तविकता यह है कि बीजेपी ने न केवल राहुल गांधी को बल्कि हर बड़े विपक्षी नेता को कुचल दिया है.
अखिलेश यादव और मायावती, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनाया था और यह कुछ चुनौती देता दिख रहा था. लेकिन आख़िरकार यह भी एक ओर बह गया.
नरेंद्र मोदी का सीधा सामना करने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की हार का अपमान सहना पड़ा.
यहां तक कि उनके पूर्व सहयोगी जिन्होंने उन्हें आड़े हाथ लेने की कोशिश की, उन्हें भी उनकी जगह दिखा दी- चाहे वो ओडिशा में नवीन पटनायक हों या टीएसआर नेता के चंद्रशेखर राव जिन्होंने खुद को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में भी पेश करते हुए दक्षिण में विपक्षी गठबंधन बनाने की कोशिश की.